मंगलवार, 14 अगस्त 2012

गांधी बनना आसान नहीं



  गांधी बनना  आसान नहीं 
"गांधी बनना  आसान नहीं ".
पहले गांधी से प्रेम हुआ 
अनसन साधन का खेल हुआ .
जब मिला ज्ञान- यह नहीं खेल 
अनसन- सत्ता का नहीं मेल.
तब भाव ह्रदय के छलक उठे 
कुछ पा जाने को ललक उठे
जिसके विरुद्ध से लगते थे 
जिस पर अपशब्द निकलते थे 
उसको ही तो बस पाना था 
उस घर में ही बस जाना था 
जनता करती थी बस पुकार 
कर दो, कर दो कुछ चमत्कार
भ्रष्टाचारी  से मिले मुक्ति 
अब करो तुम्ही कुछ प्रखर युक्ति
सपना तो सुन्दर दिखलाया 
कुछ  पाल जाल से भरमाया 
अनशन से प्राण अशक्त हुआ 
शीतल जब कुछ-कुछ रक्त हुआ 
तब, कहा ह्रदय ने नहीं-नहीं 
गांधी का मार्ग वरेण्य नहीं 
जिस पथ से मिलता सिंघासन 
वह पथ कुछ और, नहीं अनशन 
फिर तो अनशन व्रत टूट गया 
वह " मार " इन्हें भी लूट गया 
गांधी बनना  आसान नहीं 
यह धैर्यहीन का काम नहीं
जिसमें जज्बे की आंधी है
समझो उसमें ही गांधी है.
    ---अरविन्द पाण्डेय 

बुधवार, 7 सितंबर 2011

लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती

लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती
हिम्मत करनेवालों की कभी हार नहीं होती
नन्हीं चीटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों में साहस बाँटता है
चढ़कर गिरना, फिर उठकर चढ़ना न अखरता है
आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
कोशिश करनेवालों की कभी हार नहीं होती
असफलता एक चुनौती है ,स्वीकार करो
क्या कमी रह गयी देखो और सुधार करो
जब तक न सफल हो नींद चैन की त्यागो तुम
कुछ किए बिना ही जय-जयकार नहीं होती
हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती.

एक है

वन के पक्षी हैं अनेकों पर ठिकाना एक है
सबकी भाषाएँ अलग है पर तराना एक है
दिल में यदि प्यार है तो सारा जमाना एक है
हम शिकारी भिन्न हैं लेकिन निशाना एक है
पर्वत को भी तुम धूल बना सकते हो
उंगली पर हिमालय को उठा सकते हो
विश्वास रख अगर एक हो जाओ
आकाश को धरती पर झुका सकते हो
तुम हंसते हुए आग पर चल सकते हो
तुम चाँद से आगे भी निकल सकते हो
यदि ठीक तरह शक्ति का उपयोग करो
तुम समय की धारा बदल सकते हो
भला बुरा न कोई रूप से कहलाता है
की दृष्टिभेद स्वयं दोष- गुण दिखता है
कोई कमल की कली देखता है कीचड में
किसी को चाँद में भी दाग नजर आता है.

मंगलवार, 4 मई 2010

बाँकी है ।

बाँकी है ।

फैल चुके हो गुब्बारे की तरह तुम
बस एक कील चुभाना बाँकी है ।
प्रश्नों की श्रृंखला से घेर चुका हूँ तुमको
बस एक आरटीआई लगाना बाँकी है ।
काफी परीक्षा हो चुकी हमारी
अब तो मात्र प्रमाणपत्र लेना बाँकी है ।
भ्रष्टाचार के चारों तरफ पेट्रोल डाल चुका हूँ मैं
अब आग ईमानदारी का लगाना बाँकी है ।
क्रिकेट के पचड़े में ही पड़े रहेंगे जमाने वाले
देश की समस्याओं का समाधान अभी बाँकी है ।
भरोसा दिलाया है वित्तमंत्री ने हमको
सब कुछ ठीक हो जाएगा एक झटके में
बस काला धन को वापस लाना बाँकी है ।
बिना तैयारी के हम चले थे नक्सलवाद मिटाने
कुछ लाश और आने बाँकी है ।
समया को ये नहीं उपर से देखेंगे
इतजार करें, एक नया आयोग बनना बाँकी है ।
खत्म हो गई अब सीबीआई के प्रति विश्‍वसीयता
पता नहीं क्यों कुछ लोगों को अभी भी आस बाँकी है ।
हद की सीमा पार करनेवाले पता नहीं क्यों है बेखबर
उनको हद में लाने वाले अंकुश का निर्माण अभी बाँकी है
क्या हिटलरशाही व्यवस्था ही ठीक कर सकती है देश को?
या देश की जनता को बापू के प्रति विश्‍वास अभी बाँकी है ।
वादा है मेरा आपसे नकाब हटा दूँगा उनका
सुबह देखना फिर एक सच्चाई, अभी तो रात बाँकी है
सावधान कर रहा हूँ गाँव के प्रेमियों को
खास पंचायतों के फैसले आने बाँकी है ।

- गोपाल प्रसाद
4/19 A, साकेत ब्लॉक
मंडावली, दिल्ली - 92
मो० - 9289723145

तनहाई के तराने

रोशनी से दूर
बादलों के घेरे में
फिजा मेरी तकदीर लिखती है
बेरहम अंधेरों में

न जाने कौन सी नशीली चाहत
घूंघट ओढ़े आती है
दबे पांव रात के सन्‍नाटे में
मेरे दिल को बहलाने,
काश, पल भर कैद होती तकदीर
उस हसीन तनहाइयों में

आरजू है इस मुसाफिर की
मंजिल मिले न मिले
जिन्दगी का कारवां चलता रहे
उस लम्हे की तलाश में
खोया है जो किसी हसीन
पलकों के साये में
जैसे भटके हुए सुर चलें
अपनी साज की तलाश में ।

- सोमनाथ सरकार

हालचाल

जब भी कोई कहता है
‘सुनो आदमी’
समझ में आता है
कि अपने भीतर के
जंगल और जानवर को मारो,
जब भी कोई कहता है
‘बनो आदमी’
समझ में आता है
कि मेरे भीतर
कितना बचा है
जंगल और जानवर?
लेकिन
एक फर्क है
आदमी और जानवर में
जानवर,
भविष्य की योजनाएं तो बनाता है
लेकिन नहीं रख सकता यादों में
किसी को सहेजकर
और मैं,
उल्टे पांव चलती इस दुनिया में
जो मुझे अच्छा लगा
उसे भूलना नहीं चाहता...
बताइएं,
कैसे हैं आप?

- अजय यादव

बुधवार, 7 अक्तूबर 2009

ये लड़कियाँ

खुद इस्तेमाल हो रही ये लड़कियाँ,
पश्‍चिमी सभ्यता के मोहपाश में,
जकड़ी जा रही हैं ये लड़कियाँ,
नहाने के साबुन से कंडोम के विज्ञापन तक में,
अपना जिस्म दिखा रही हैं ये लड़कियाँ,
कभी फैशन शो में, कभी चीयर्स गर्ल बनकर,
जलवे दिखा रही हैं ये लड़कियाँ,
जिस्म को ढकने के बजाय जिसने,
दिखाने की वस्तु बना दिया,
खुद बदनाम हो गई हैं ये लड़कियाँ,
क्या उम्मीद करूँ बनेगी कोई लक्ष्मीबाई,
जन्म लेगी अब कोई सीतामाई?
जब संस्कृति और संस्कार को नहीं जानेगी,
हम क्या थे, क्या हैं और क्या होंगे?
जब तक जानेंगी नहीं ये लड़कियाँ,
गिरती चली जाएँगी, पतन होता जाएगा,
आपको लगता है सम्मान दिलाएँगी ये लड़कियाँ?
इनको सुधारने क्या कोई नया जन्म लेगी?
अब भी वक्‍त है सुधर जाओ संभल जाओ,
गुजरे जमाने का आदर्श छोड़ रही हैं ये लड़कियाँ,
तलाक, हत्या और बलात्कार की शिकार ये हो रहीं,
जिंदा जलाए जाने की खबर बन रही ये लड़कियाँ,
कहाँ गई वो शर्म, हया, वो त्याग , वो भावना,
कभी आदर्श हुआ करती थी ये लड़कियाँ,
शायरों, कवियों, गजलकारों की विषय जो हुआ करती थी,
डॉक्टरों के यहाँ गर्भपात करा रही ये लड़कियाँ,
आजादी का गलत अर्थ जब-जब निकालेंगे,
बद नहीं बल्कि बदतर हो जाएँगी ये लड़कियाँ,
चाहे हो हिंदू, मुसलमान, सिख, या इसाई,
कभी न कभी होंगी परायी ये लड़कियाँ,
सास-ससुर, ननद और देवर-जेठ के नखरे,
शिक्षा दो इनको कैसे भार उठाएँगी ये लड़कियाँ,
नारी के नारीत्व को जब ये अपनाएँगी,
खुद की ही नहीं, समाज की भी पहचान बनेंगी ये लड़कियाँ ।